कोरोना से बचने को दुनिया ने माना भारतीय संस्कृति का लोहा




 



नई दिल्ली। भारत को ऐसे ही विश्व गुरु नहीं रहा है। यह हमारी संस्कृति रही है कि पूरी दुनिया ने हमारा लोहा माना है। हां जब से हम आधुनिकता की दौड़ का हवाला देते हुए पश्चिमी सभ्यता की ओर लपके हैं तब से न केवल हमारी जीवन शैली में बदलाव आया बल्कि हमारी संस्कृति पर भी कुठाराघात हुआ है। यह भारतीय संस्कृति का प्रभाव ही रहा है कि लोग खून के साथ ही भावनात्मक रिश्तों में जो बंधे एक-दूसरे के काम आते रहे हैं। इस परंपरा ने न केवल देश बल्कि विदेश में भी अमिट छाप छोड़ी है। यह हमारी देश की ही संस्कृति ही है कि आदमी बिना किसी स्वार्थ के एक दूसरे पर कुर्बान होता रहा है। अपनी संस्कृति के बल पर हम लोग बड़ी से बड़ी आपदा से भी लड़ते रहे हैं। चाहे भुज भूकंप हो, बद्रीनाथ और केदारनाथ पर आई आपदा हो या फिर कोई महामारी हमने एकजुट होकर हर तबाही से मोर्चा लिया है। भले ही देश में सियासत हर समय देश के भाईचारे को तबाह करने करने पर उतारू रहती है पर यह देश की संस्कृति की ताकत है कि लोग जाति धर्म को भुलाकर हर परेशानी से लड़ते रहे हैं।



कहा जाता है कि बुरे वक्त में ही अच्छी चीज याद आती है। ऐसा ही पूरी दुनिया के कोरोना वायरस की चपेट में आने पर हो रहा है। जब पूरी दुनिया कोरोना से लड़ने के लिए अपने हर प्रयास कर हार चुकी है तो सबको भारतीय संस्कृति ही बचाव़ का एक रास्ता नजर आ रही है। भले ही लोग नमस्ते या फिर राम-राम करने वाले लोगों को पुराने ख्यालों वाला बताने लगे हों पर कोरोना वायरस से बचने के लिए न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया को दूर से नमस्ते करने की भारतीय संस्कृति याद आ रही है। पुरी दुनिया में जहां हाथ मिलाने की पश्चिमी सभ्यता को त्याग कर भारत की दूर से हाथ जोड़कर अभिवादन करने की परंपरा को अपनाने पर जोर दिया जा रहा है वहीं भारतीय संस्कृति का मुख्य हिस्सा रहे योग को अपनाकर कोरोना से बचने की सलाह दी जा रह है। जहां चीन के बाद सबसे अधिक तबाह होने वाले इरान ने भारतीय संस्कृति के अनुसार दूर से हाथ जोड़कर नमस्ते करने पर जोर दिया है वहीं अमेरिका के एक प्रमुख चिकित्सा संस्थान हार्वर्ड मेडिकल स्कूल ने कहा है कि योग, ध्यान एवं सांस लेने पर नियंत्रण, शांत होने के कुछ सही एवं आजमाए हुए तरीके हैं। मतलब कोरोना से बचने के लिए योग को अपनाएं। 'कोरोना वायरस की व्यग्रता से निपटनेÓ विषय पर एक लेख इसी हफ्ते प्रकाशित हुआ है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के संकाय एवं यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के डेविड गेफेन स्कूल ऑफ मेडिसिन के बोर्ड प्रमाणित मनोरोग चिकित्सक जॉन शार्प ने कहा कहा है कि 'नियमित ध्यान बहुत राहत देने वाला है।Ó



यह हमारी संस्कृति और विदेशी संस्कृति का अंतर ही है कि कोरोना के खौफ से जहां विदेश में करीबी से करीबी व्यक्ति कोरोना मरीज से छुटकारा पाने के लिए उसे त्याग दे रहा है, उससे मुंह मोड़ ले रहा है वहीं हमारे देश में एक-दूसरे की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ रहे हैं। सेना, चिकित्सक से लेकर आम आदमी तक सब कोरोना से लड़ने के लिए खड़े हो गये हैं। यह भारतीय संस्कृति ही है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के कोरेाना से लड़ने के तरीके की सराहना हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना से लड़ने की भारत के प्रयास की सराहना की है। यह भारतीय संस्कृति ही है कि जहां पाकिस्तन की सेना में सैनिक ड्यूटी पर जाने से इनकार कर रहे हैं वहीं हमारी सेना ने कोरोना से लोगों को बचाने के लिए पूरी तरह से मोर्चा संभाल रखा है। सेना के विभिन्न अस्पतालों में कोराना का चेकअप से लेकर इलाज तक किया जा रहा है। देश के बड़े से बड़े चिकित्सा संस्थान से जुड़े चिकित्सकों ने आगे बढ़कर कोरोना मरीजों की सेवा के लिए हाथ बढ़ाए हैं। जहां विदेश में चिकित्सक व नर्संे कोरोना के मरीजों के पास जाने से डर रहे हैं वहीं भारतीय चिकित्सक मरीजों की सेवा के लिए खुद आगे आ रहे हैं। चीन में जहां कोरोना मरीजों को गोली मारने की खबरें सामने आई थीं वहीं भारत विदेश में रह रहे भारतीयों को अपने देश में लाकर उनका चेकअप और इलाज करा रहा है।



कोरोना से पूरी दुनिया में एक संदेश यह भी गया है कि विभिन्न संसाधनों से परिपूर्ण दिखावे की तनाह जिंदगी से अभाव की प्यार-मोहब्बत की जिंदगी कहीं ज्यादा अच्छी है। कोरोना के खौफ के बीच लोग अभाव में भाईचारे के साथ एक दूसरे के दुख-दर्द बांटने की भारतीय परंपरा को याद करने लगे हैं। जिस तरह से कोरोना वायरस से लोग मर रहे हैं, लोगों की समझ में आ गया है कि जब तक सांस है तब तक सब कुछ है। मतलब भारतीय संस्कृति में बंधकर एक दूसरे के दुख-दर्द बांटते एक दूसरे की खुशी में शामिल होते हुए आगे बढ़ने से बढ़िया जिंदगी कोई दूसरी नहीं है। भले ही यह जिंदगी अभाव की हो। वैसे भी भारतीय संस्कृति में कितनी बड़ी से बड़ी परेशानी को परिवार में बैठकर हल करने की परंपरा रही है। आज की तारीख में तमाम संसाधनों के परिपूर्ण होने के बावजूद आदमी एक से बढ़कर एक गंभीर बीमारी लिये गये घूम रहा है।